उत्तराखंड में दुधारू पशुओं की दुर्दशा

देवभूमि उत्तराखंड प्राचीन काल से  देवताओं और तपस्वी ऋषियों की भूमि रहा है, प्राकृतिक सुन्दरता, पौष्टिक भोजन, स्वच्छ जलवायु इसे अलौकिक स्थल  बनाता है,
यहाँ के निवासी सामान्य रूप से कृषक व पशुपालक है, पहाड़ की जिंदगी को बहुत कठिन माना  जाता  है, खेती व पशुपालन में महिलाएं  बहुत बड़ा योगदान देती हैं, 
 पशुओं के साथ उत्तराखंडियों का बहुत गहन सम्बन्ध रहा है, या यूं कहें  कि पशुपालन उत्तराखंड का एक प्रमुख आजीविका का साधन है, कुछ दशक पहले जब कोई मेहमान घर आता तो उसका  हम पहाड़ी पौष्टिक व्यंजन व घी, दूध से सत्कार करते तो वह अत्यंत खुशी की अनुभूति करता और दूर दूर तक अथिति सत्कार की प्रशंसा करता| किन्तु वर्तमान परिस्थिति बिल्कुल विपरीत हो चुकी है,  आज पशुपालन कोई नहीं करना चाहता, ना ही कोई दूध घी परोसने का इच्छुक है | आज वो पशु सड़को पर प्लास्टिक व कचरा खा कर आवारा घूम रहें है, और यदि कोई उन्हें पालता, तो वह भी उनकी क्या दुर्दशा करता इस बात से सब विज्ञ हैं |

भैंस एक प्रमुख दुधारू पशु 

  
 
भैंस को समाज शुभ नहीं मानते , उस पर ना जाने क्या क्या   मुहवारे व कहावते बनी  हैं जैसे काला अक्षर भैंस बराबर, अकल बड़ी या भैंस, भैंस के आगे बीन बजाना इत्यादि, किन्तु उत्तराखंड व देश  में अधिकतर दुग्ध आपूर्ति भैंस ही करते हैं, जिससे कई प्रकार के दुग्ध पदार्थो का उत्पादन किया जाता है| अगर गाय हमारी माता है तो भैंस को भी माता कहने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए |कुछ दशक पहले उत्तराखंड के लोग चौमास (बर्षा ऋतू ) में मवेशियों( जिनमें प्रमुखतः भैंस जरूर होती थी ) को लेकर सुन्दर बुग्यालों, व जंगलो में जाते थे, वहां चारे की प्रयाप्तता होती थी,  साथ में सुन्दर घास के मैदानों,  पर्वत श्रृंखलाओ के बीच स्वस्थ दिनचर्या व्यतीत करते थे| दूध, दही, छाछ जैसे पौष्टिक पदार्थो का उपभोग करते थे,  जब घर लौटते तो उस दिन को उत्सव के रूप में मनाते थे| लेकिन आज हम इस परम्परा को ना जाने कहाँ पीछे छोड़ चुके है|
गाय 
गाय का हमारी संस्कृति में प्रमुख स्थान है, उसे हम पूजनीय मानते है, प्राचीन काल में गाय का क्या स्थान था उसे हम अपने ग्रंथो में पढ़ते है,  गाय मनुष्यों की सर्वोच्च सम्पति हुआ करती थी,  कामधेनु गाय के कारण गुरु बशिष्ठ व राजा विश्वरथ ( जो कालांतर में विश्वामित्र ऋषि बने ) के बीच युद्ध हुआ| यज्ञों में गाये दान दी जाती थी,  इन  सब बातों  से पता चलता है कि गायें कितनी महत्वपूर्ण थी| आज हम दिखावा करते है कि गाये हमारे लिए पूजनीय हैं जबकि हमारे सामने वो आवारा घूमती हुई व कचरा खाती हुई नजर आती हैं| कुछ लोग गायों को केवल तब तक पालते हैं जब तक वह दूध देती हैं, उसके बाद उसे आवारा छोड़ दिया जाता हैं |

पशुओं के साथ क्रूरता 
उत्तराखंड में पशु क्रूरता बीते कुछ दशकों  में बहुत बढ़ गयी है | पशुओं को तब तक पाला जाता है जब तक वह दूध दे रहा हो, समय समय पर कई बातें सुनने में आती हैं,  कुछ लोग उन्हें जंगल में बांध  देते हैं,  कुछ उनको आवारा छोड़ देते हैं यहाँ तक कि  उनकी हत्याएं की बातें भी सामने आती है |
उत्तराखंड के कई स्थानों पर एक ऐसा गिरोह भी शामिल है जो पशुओं का तस्कर करने में लगे हुए हैं | गायों  पर सख्ताई के कारण अब गायों का तस्कर नहीं हो पता वो आवारा छोड़ दी जाती है | भैंस का निरंतर तस्कर होता रहा है | 
यदि हम उत्तराखंड को समृद्ध  बनाना चाहते हैं तो हमें इन्हे रोकने के उपाय करने चाहिए, सरकारों को भी पशु संरक्षण में आगे आना चाहिए व पशुपालन सम्बंधित योजनाएं बनानी चाहिए, ताकि पशुपालन को राज्य में पुनर्स्थापित आधुनिकता के साथ किया जा सके| पशु क्रूरता के लिए अपराधियों को सख्त सजा मिलनी चाहिए,  तस्कर गिरोह को तत्काल रोका जाना चाहिए , लोंगो को भी पशुओं के प्रति सजग रहने की आवश्यकता है सब अपने स्तर से पशुओं को संरक्षण प्रदान करने की मुहिम चलाएं |




लेखक 
दिनेश आगरी 'भार्गव'. 

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