चिकित्सा के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार 2020
प्रारंभिक यानि अतिपाती (एक्यूट हेपेटाइटिस) की अवस्था प्रारंभ से लेकर कम से कम छह महीने तक रहती है।
पुरानी यानि चिरकालिक या दीर्घकालिक (क्रॉनिक हेपेटाइटिस) यह लंबे समय तक बनी रहती है।
वायरसों का समूह जैसे कि हेपेटाइटिस वायरस रोग को पैदा करने के लिए जाना जाता है परन्तु यह कुछ विषाक्त पदार्थों (विशेष रूप से खास अल्कोहॉल्स, नियत दवाओं, कुछ औद्योगिक विलयन और पौधों) तथा अन्य प्रकार के संक्रमणों और ऑटोइम्यून की वज़ह से भी हो सकता है।
हेपेटाइटिस के प्रकार
हेपेटाइटिस के मुख्य निम्नलिखित प्रकार है :
हेपेटाइटिस ए
यह रोग हेपेटाइटिस ए वायरस के कारण होता है। यह हेपेटाइटिस वायरल का सामान्य रूप है। यह रोग उन क्षेत्रों में पाया जाता है, जहाँ स्वच्छता और मल निष्कासन का उचित प्रबंध नहीं होता है। आमतौर पर यह रोग मुखगत: या मल संदूषण के माध्यम से फैलता है। यह आमतौर पर अल्पकालिक (एक्यूट/प्रारंभिक यानि अतिपाती) संक्रमण है। इसके लक्षण तीन महीने के भीतर से समाप्त हो जाते हैं। हेपेटाइटिस ए का दवाओं का उपयोग करने के अलावा कोई विशेष उपचार नहीं है। ।
हेपेटाइटिस बी
यह रोग हेपेटाइटिस बी वायरस के कारण होता है। यह रक्त और शरीर से निकलने वाले संक्रमित स्रावों जैसे कि वीर्य और योनि के तरल प्रदार्थों पाया जाता है इसलिए आमतौर पर यह असुरक्षित सेक्स और पहले से इस्तेमाल की गई सुइयों के दोबारा इस्तेमाल करने से फैलता है। हेपेटाइटिस बी ड्रग्स लेने वालों में विशेषत: से पाया जाता है। यह भारत सहित संसार के विभिन्न भागों जैसे कि चीन, मध्य और दक्षिण-पूर्व एशिया तथा उप सहारा के अफ्रीकी देशों में मुख्यतः पाया जाता है। हेपेटाइटिस बी से संक्रमित अधिकांश लोगों को वायरस से लड़ने और संक्रमण से पूरी तरह ठीक होने में दो महीनें लगते है। इस संक्रमण के साथ जीना कष्टदायक हो सकता है लेकिन आमतौर पर यह किसी स्थायी नुकसान का कारण नहीं बनता है। हालांकि, लोगों के एक छोटे से अल्पसंख्यक समुदाय में लंबी अवधि तक संक्रमण का विकास हो सकता है तब इसे क्रोनिक हेपेटाइटिस बी के रूप में जाना जाता है। हेपेटाइटिस बी के लिए टीका उपलब्ध है जो कि उच्च जोखिम वाले समूह के लोगों जैसे कि नशा करने वालों के लिए अनुशंसित किया जाता है।
हेपेटाइटिस सी
यह रोग हेपेटाइटिस सी वायरस की वज़ह से होता है। बहुत हद तक यह वायरस संक्रमित व्यक्ति के रक्त, लार, वीर्य और योनि से निकलने वाले तरल प्रदार्थों में पाया जाता है। यह वायरस विशेष रूप से रक्त में केंद्रित होता है इसलिए यह आमतौर पर ‘रक्त से रक्त’ संपर्क के माध्यम से फैलता है। कभी-कभी हेपेटाइटिस सी का लक्षण स्पष्ट दिखाई नहीं देता है या इसका लक्षण फ़्लू को ग़लती से समझ लिया जाता है इसलिए कई लोग यह जान नहीं पाते है कि वे हेपेटाइटिस सी के वायरस से संक्रमित है। बहुत सारे लोग संक्रमण से लड़कर वायरस से मुक्त हो जाते है। बचा हुआ वायरस कई वर्षों तक शरीर में पड़ा रहता है। इसे क्रोनिक हेपेटाइटिस सी के रूप में जाना जाता है। क्रोनिक हेपेटाइटिस सी का इलाज एंटीवायरल दवाओं के द्वारा किया जा सकता है यद्यपि इन दवाओं का स्वाथ्य पर दुष्प्रभाव भी पड़ता है। वर्तमान समय में हेपेटाइटिस सी के लिए कोई टीका उपलब्ध नहीं है।
हेपेटाइटिस सी लिवर सिरोसिस एवं लिवर कैंसर जैसी गंभीर बीमारी के लिए उत्तरदायी हैं
प्रत्येक वर्ष 28 जुलाई को हेपेटाइटिस दिवस के रूप में मनाया जाता हैं, ताकि हेपेटाइटिस के प्रति लोंगो को जागरूक किया जा सके
करोलिंस्का इंस्टीट्यूट ने सोमवार को एक बयान में कहा।"इतिहास में पहली बार, यह बीमारी अब ठीक हो सकती है, दुनिया की आबादी से हेपेटाइटिस सी वायरस के उन्मूलन की उम्मीदें बढ़ी हैं,"
वही नोबेल पुरस्कार समिति ने कहा कि इतिहास में पहली बार, यह बीमारी अब ठीक हो सकती है, जिससे हेपेटाइटिस सी वायरस के उन्मूलन की उम्मीद जग गई है।
एक अनुमान के अनुसार दुनिया भर में 270-300 मिलियन लोग हेपेटाइटिस सी से संक्रमित हैं तथा भारत में हर साल 1मिलियन लोग इससे प्रभावित होते हैं . हेपेटाइटिस सी पूरी तरह से मानव रोग है. इसे किसी अन्य जानवर से प्राप्त नहीं किया जा सकता है न ही उन्हें दिया जा सकता है. चिम्पांजियों को प्रयोगशाला में इस वायरस से संक्रमित किया जा सकता है लेकिन उनमें यह बीमारी नहीं पनपती है,
हेपेटाइटिस सी वायरस छोटा (आकार में 50 एनएम), घिरा हुआ, एकल-असहाय, सकारात्मक भाव वाला आरएनए (RNA) वायरस है. यह फ्लाविविरिडी (Flaviviridae) परिवार में हेपसीवायरस जीनस का एकमात्र ज्ञात सदस्य है
हेपेटाइटिस ए और हेपेटाइटिस बी के वायरस 1960 के दशक के मध्य तक खोजे जा चुके थे।
लेकिन प्रो हार्वे ऑल्टर ने 1972 में यूएस नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ में ट्रांसफ्यूजन रोगियों का अध्ययन करते हुए देखा एक नए वायरस से लोग संक्रमित हो रहें हैं । रक्तदान करने के बाद भी मरीज बीमार हो रहे थे।
उन्होंने देखा कि संक्रमित रोगियों से चिम्पांजी को रक्त देने से उनमें बीमारी विकसित हुई।
रहस्यमय बीमारी को "नॉन-ए, नॉन-बी" हेपेटाइटिस के रूप में जाना गया ।
प्रोफ़ेसर माइकल ह्यूटन, फ़ार्मास्यूटिकल फ़र्म चिरोन में 1989 में वायरस के आनुवंशिक अनुक्रम को अलग करने में कामयाब रहे। इससे पता चला कि यह एक प्रकार का फ्लेविवायरस था और इसे हेपेटाइटिस सी नाम दिया गया था।
और प्रोफेसर चार्ल्स राइस ने सेंट लुइस में वाशिंगटन विश्वविद्यालय में, 1997को उन्होंने एक जेनेटीकल इंजीनियरीड हेपेटाइटिस सी वायरस को चिंपांज़ी के जिगर में इंजेक्ट किया और दिखाया कि इससे हेपेटाइटिस हो सकता है।
निश्चित ही इस महान खोज के लिए वैज्ञानिक प्रशंसा के अधिकारी हैं |
दिनेश आगरी "भार्गव "
सन्दर्भ ÷ विकसपीडिया, विकिपीडिया, BBC news, DW News
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